ASSEB Class 9 Hindi Chapter 11 (नर ही, न निराशा करी मन की) Question Answer 2026 | Class 9 Hindi Chapter 11 Solution

नर ही, न निराशा करी मन की

(अ) सही विकल्प का चयन करो:

1. कवि ने हमें प्रेरणा दी है-
उत्तर: कर्म की।

2. कवि के अनुसार मनुष्य को अमरत्व प्राप्त हो सकता है-
उत्तर: अपने श्रेष्ठ कर्मों और व्यक्तित्व से।

3. कवि के अनुसार ‘नर हो, न निराश करो मन को’ का आशय है-
उत्तर: मनुष्य को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी साहस नहीं खोना चाहिए और पुरुषार्थ द्वारा सफलता प्राप्त करनी चाहिए।

(आ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखो:

1. तन को उपयुक्त बनाए रखने के क्या उपाय हैं?
उत्तर: कवि के अनुसार तन (शरीर) को उपयुक्त बनाए रखने का सबसे उत्तम उपाय ‘कर्म’ है। मनुष्य को आलस्य त्यागकर निरंतर कुछ न कुछ सार्थक कार्य करते रहना चाहिए। शरीर की सार्थकता तभी है जब वह किसी लक्ष्य की प्राप्ति में लगा हो। हाथ पर हाथ धरकर बैठने के बजाय अपने कौशल का सदुपयोग करना ही शरीर को सुयोग्य बनाए रखने का मार्ग है।

2. कवि के अनुसार जग को निरा सपना क्यों नहीं समझना चाहिए?
उत्तर: कवि का मानना है कि यह संसार केवल कल्पना या स्वप्न मात्र नहीं है, बल्कि यह ‘कर्मभूमि’ है। यदि हम इसे केवल सपना मान लेंगे, तो हम हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहेंगे। जीवन में वास्तविक उपलब्धियाँ केवल कर्म से प्राप्त होती हैं। जो व्यक्ति परिश्रम करता है और अपने प्रशस्त मार्ग को स्वयं चुनता है, उसे ईश्वर का साथ भी प्राप्त होता है। अतः जीवन के यथार्थ को स्वीकार कर कर्मशील बनना आवश्यक है।

3. ‘अमरत्व-विधान’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: ‘अमरत्व-विधान’ से कवि का तात्पर्य उस ईश्वरीय व्यवस्था से है, जिसके अंतर्गत मनुष्य को वे सभी शक्तियाँ और साधन (तत्त्व) प्राप्त हैं जो उसे महान बना सकते हैं। यदि मनुष्य अपने भीतर छिपी प्रतिभा और सामर्थ्य को पहचान ले, तो वह असंभव को भी संभव कर सकता है। अपने सत्कर्मों के द्वारा वह मृत्यु के बाद भी लोगों के हृदय में जीवित रह सकता है, यही वास्तविक अमरत्व है।

4. अपने गौरव का किस प्रकार ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: हमें सदैव यह बोध होना चाहिए कि हम ‘मनुष्य’ हैं और हमारी अपनी एक गरिमा है। हमें अपनी शक्ति पर अटूट विश्वास रखना चाहिए (‘निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे’)। साथ ही, हमारा आचरण ऐसा होना चाहिए जिससे हमारे स्वाभिमान और कुल की प्रतिष्ठा को कभी आंच न आए। हमें अहंकार से बचते हुए अपने अस्तित्व की सार्थकता सिद्ध करनी चाहिए ताकि मृत्यु के पश्चात भी संसार हमें आदर के साथ याद रखे।

5. कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर: इस कविता का मुख्य प्रतिपाद्य ‘कर्मवाद’ और ‘आत्मविश्वास’ है। कवि मैथिलीशरण गुप्त जी संदेश देते हैं कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, इसलिए उसे निराश होकर बैठना शोभा नहीं देता। जीवन की सार्थकता कर्म करने में है, न कि भाग्य के भरोसे रहने में। कविता हमें सिखाती है कि असफलता से घबराने के बजाय अपनी त्रुटियों को सुधारकर पुनः प्रयास करना चाहिए। ईश्वर ने हमें सभी आवश्यक योग्यताएँ दी हैं; बस हमें आलस्य त्यागकर अपने गौरव की रक्षा करते हुए निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

(इ) सप्रसंग व्याख्या करो:

1. ‘संँभलो कि सु-योग न जाए चला, कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला?’

संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक भाग-1’ के अंतर्गत राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रेरणादायी कविता ‘नर हो, न निराश करो मन को’ से उद्धृत हैं।

प्रसंग: यहाँ कवि समय के महत्व और सही अवसर को पहचानने की प्रेरणा दे रहे हैं।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि हे मनुष्य! सचेत हो जाओ और अपने जीवन में आने वाले सुनहरे अवसरों (सुयोग) को व्यर्थ न जाने दो। यदि समय बीत गया, तो केवल पछतावा हाथ लगेगा। कवि प्रश्न करते हैं कि क्या कभी कोई श्रेष्ठ प्रयास (सदुपाय) बेकार गया है? अर्थात, यदि हम सही दिशा में सही समय पर प्रयास करते हैं, तो उसका फल निश्चित रूप से सुखद और सफल होता है।

2. ‘जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ, फिर जा सकता वह स्वत्व कहाँ?’

संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आलोक भाग-1’ के अंतर्गत राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘नर हो, न निराश करो मन को’ से उद्धृत हैं।

प्रसंग: यहाँ कवि मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्तियों और अधिकारों का बोध करा रहे हैं।

व्याख्या: कवि का तर्क है कि इस संसार में सफलता प्राप्त करने के लिए जितने भी गुण, साधन या पंचतत्त्व आवश्यक हैं, वे सभी मनुष्य को ईश्वर ने प्रदान किए हैं। जब हमारे पास सामर्थ्य के सभी साधन मौजूद हैं, तो फिर हमारा अधिकार (स्वत्व) या गौरव हमसे दूर कैसे रह सकता है? यदि हम पुरुषार्थ करें, तो सफलता रूपी सत्य हमें अवश्य प्राप्त होगा। हमें बस स्वयं को पहचानने और कर्म में जुट जाने की आवश्यकता है।

संक्षिप्त प्रश्न (Short type questions)

1. इस कविता का मूल उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इस कविता का मूल उद्देश्य मनुष्य को स्वावलंबन, कर्मठता और आत्मविश्वास का संदेश देना है। कवि का मानना है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है, अतः उसे निराशा त्यागकर पुरुषार्थ करना चाहिए और अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

2. कवि ने मन को निराश करने से मना क्यों किया है?
उत्तर: कवि ने मन को निराश करने से इसलिए मना किया है क्योंकि निराशा मनुष्य की कार्यक्षमता और संकल्प शक्ति को नष्ट कर देती है। निराशा में डूबा व्यक्ति सामने आए सुअवसरों को पहचान नहीं पाता और आत्म-गौरव खो बैठता है।

3. हमें अपने शरीर को किसके लिए उपयुक्त करना चाहिए और क्यों?
उत्तर: हमें अपने शरीर (तन) को सत्कर्मों और परोपकार के लिए उपयुक्त करना चाहिए। चूँकि यह मानव देह दुर्लभ है, इसलिए इसे आलस्य में गँवाने के बजाय किसी सार्थक उद्देश्य की प्राप्ति में लगाना चाहिए ताकि जीवन की सार्थकता सिद्ध हो सके।

4. अमरत्व प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर: अमरत्व प्राप्त करने के लिए हमें अपने ‘स्वत्व’ (निज गौरव) को पहचानना होगा। गौरवपूर्ण कार्य, कठिन परिश्रम और मृत्यु के पश्चात भी याद किए जाने वाले परोपकारी कार्यों के माध्यम से ही मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर सकता है।

5. तन को उपयुक्त बनाए रखने के क्या उपाय हैं?
उत्तर: तन को उपयुक्त बनाए रखने का सर्वोत्तम उपाय निरंतर कर्मशील रहना है। कवि के अनुसार, उचित समय पर सही अवसर (सुयोग) को पहचानना और अपने कौशल का सदुपयोग करना ही शरीर की सार्थकता बनाए रखने का उपाय है।

6. कवि के अनुसार जग को निरा सपना क्यों नहीं समझना चाहिए?
उत्तर: जग को ‘निरा सपना’ समझना कर्महीनता को बढ़ावा देता है। यदि हम संसार को केवल सपना मानेंगे, तो हम इसके प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भूल जाएंगे। यह संसार एक यथार्थ कर्मभूमि है जहाँ परिश्रम द्वारा ही सफलता प्राप्त की जा सकती है।

7. ‘अमरत्व-विधान’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: ‘अमरत्व-विधान’ से तात्पर्य ऐसी जीवन पद्धति से है जिसमें मनुष्य अपने पुरुषार्थ और श्रेष्ठ चरित्र द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ले। अर्थात, व्यक्ति संसार से चले जाने के बाद भी अपने आदर्शों और कार्यों के कारण सदैव जीवित रहे।

8. अपने गौरव का किस प्रकार ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: अपने गौरव का ध्यान रखने के लिए हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि हम ‘नर’ (मनुष्य) हैं। हमें अपनी मर्यादा, आत्म-सम्मान और मानवीय मूल्यों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए और सदैव आत्मविश्वास से भरे रहना चाहिए।

9. कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर: कविता का प्रतिपाद्य यह है कि मनुष्य को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। संसार में उपलब्ध साधनों और अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचान कर निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। निराशा मनुष्य का पतन करती है, जबकि आशा और कर्म उसे महानता की ओर ले जाते हैं।

10. मैथिलीशरण गुप्त जी द्वारा रचित दो प्रमुख काव्य ग्रंथों के नाम लिखो।
उत्तर: 1. साकेत 2. भारत-भारती।

    विवरणात्मक प्रश्न (Essay type questions)

    1. इस कविता का सारांश लिखो।
    उत्तर: ‘नर हो, न निराश करो मन को’ कविता मानवीय उत्साह का संचार करने वाली रचना है। इसमें गुप्त जी कहते हैं कि मनुष्य को ईश्वर ने हाथ-पैर और बुद्धि जैसे अनमोल उपहार दिए हैं, इसलिए उसे भाग्य के भरोसे बैठकर निराश नहीं होना चाहिए। समय का महत्व समझते हुए सही अवसर का लाभ उठाना चाहिए। मनुष्य को अपने आत्म-गौरव (Self-respect) का बोध होना चाहिए। यह संसार कर्म करने की जगह है, केवल सपने देखने की नहीं। अंत में कवि संदेश देते हैं कि जो व्यक्ति अपने अस्तित्व को पहचान कर कर्म में जुट जाता है, वह अमरता को प्राप्त करता है।

    2. प्रस्तुत कविता में आशावाद की झलक किस तरह से देखी जाती है?
    उत्तर: इस कविता की प्रत्येक पंक्ति आशावाद (Optimism) से ओत-प्रोत है। कवि कहते हैं कि “कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला?” अर्थात सही दिशा में किया गया प्रयास कभी निष्फल नहीं होता। वे मनुष्य को याद दिलाते हैं कि उसके पास सफलता पाने के सभी आवश्यक ‘तत्त्व’ मौजूद हैं। हार मान लेने के बजाय फिर से उठने और अमरत्व का विधान करने की प्रेरणा देना ही इस कविता के आशावाद का मुख्य आधार है।

    3. कवि ने मनुष्य जीवन में निराशा को प्रश्रय देना लज्जाजनक क्यों बताया है?
    उत्तर: मनुष्य को ईश्वर का अंश माना गया है। जब मनुष्य के पास सामर्थ्य, बुद्धि और अवसर है, तब भी यदि वह रोता रहे या निराश होकर बैठा रहे, तो यह उसकी सामर्थ्य का अपमान है। पुरुष होकर भी कायरों की तरह व्यवहार करना और अपने अस्तित्व को व्यर्थ समझना लज्जाजनक है, क्योंकि यह ईश्वर द्वारा दी गई शक्तियों का तिरस्कार है।

    4. आशय स्पष्ट करो:

      (क) तुम स्वत्व-सुधा-रस पान करो, उठके अमरत्व-विधान करो।
      उत्तर: इसका आशय है कि मनुष्य को अपने भीतर छिपे ‘निज गौरव’ और आत्म-सम्मान रूपी अमृत का अनुभव करना चाहिए। उसे हीनता की भावना त्याग कर ऐसे महान कार्य करने चाहिए जिससे वह संसार में सदा के लिए अमर हो जाए।

      (ख) कुछ तो उपयुक्त करो तन को, नर हो, न निराश करो मन को।
      उत्तर: कवि कहते हैं कि मनुष्य को आलस्य छोड़कर अपने शरीर को किसी न किसी सार्थक कार्य में लगाना चाहिए। मनुष्य होना एक गौरव की बात है, इसलिए मन में हीनता या निराशा को स्थान नहीं देना चाहिए।

      5. सप्रसंग व्याख्या करो:

        (क) सँभलो कि सु-योग न जाए चला, कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला?

        संदर्भ: यह पंक्ति मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘नर हो, न निराश करो मन को’ से ली गई है।

        प्रसंग: यहाँ समय की महत्ता और कर्म की सफलता पर बल दिया गया है।

        व्याख्या: कवि चेतावनी देते हैं कि समय बहुत बलवान है, इसलिए सावधान रहो ताकि हाथ आया अच्छा अवसर (सुयोग) निकल न जाए। वे विश्वास दिलाते हैं कि यदि अच्छी नीयत से कोई उपाय या मेहनत की जाए, तो वह कभी भी बेकार नहीं जाती। परिश्रम का फल अवश्य मिलता है।

        (ख) जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ, फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ?

        संदर्भ एवं प्रसंग: पूर्ववत।

        व्याख्या: कवि तर्क देते हैं कि सफलता के लिए जो भी आवश्यक गुण या पंचतत्त्व चाहिए, वे सब प्रकृति ने तुम्हें दिए हैं। ऐसी स्थिति में वह ‘सत्त्व’ (विजय या सार्थकता) तुमसे दूर कैसे रह सकती है? अर्थात यदि तुम अपनी शक्तियों का सही उपयोग करो, तो सफलता निश्चित है।

        (ग) यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो? समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।

        संदर्भ एवं प्रसंग: पूर्ववत।

        व्याख्या: कवि मनुष्य को आत्म-चिंतन की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि तुम्हें यह सोचना चाहिए कि तुम्हारे मानव जीवन का उद्देश्य क्या है। तुम्हें अपने जीवन को ऐसे कार्यों में लगाना चाहिए जिससे यह बहुमूल्य जन्म व्यर्थ न चला जाए। कर्महीनता जीवन को निरर्थक बना देती है।

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