ASSEB Class 9 Hindi Chapter 10 (दीहा-दशक) Question Answer 2026 | Class 9 Hindi Chapter 10 Solution

दीहा-दशक

1. सही विकल्प का चयन करो:

(क) कवि बिहारीलाल किस काल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं?
उत्तर: रीतिकाल के।

    (ख) कविवर बिहारी की काव्य-प्रतिभा से प्रसन्न होने वाले मुगल सम्राट थे-
    उत्तर: शाहजहाँ।

    (ग) कवि बिहारी का देहावसान कब हुआ?
    उत्तर: 1663 ई. में।

    (घ) श्रीकृष्ण के सिर पर क्या शोभित है?
    उत्तर: मोर-मुकुट।

    (ङ) कवि बिहारी ने किन्हें सदा साथ रहने वाली संपत्ति माना है?
    उत्तर: यदुपति श्रीकृष्ण को।

    2. निम्नलिखित कथन शुद्ध हैं या अशुद्ध, बताओ:

    (क) हिंदी के समस्त कवियों में भी बिहारीलाल अग्रिम पंक्ति के अधिकारी हैं।
    उत्तर: शुद्ध

      (ख) कविवर बिहारी को संस्कृत और प्राकृत के प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथों के अध्ययन का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था।
      उत्तर: अशुद्ध (उन्हें इन भाषाओं का अच्छा ज्ञान था)।

      (ग) 1645 ई. के आस-पास कवि बिहारी वृत्ति लेने जयपुर पहुँचे थे।
      उत्तर: शुद्ध

      (घ) कवि बिहारी के अनुसार ओछा व्यक्ति भी बड़ा बन सकता है।
      उत्तर: अशुद्ध

      (ङ) कवि बिहारी का कहना है कि दुर्दशाग्रस्त होने पर भी धन का संचय करते रहना कोई नीति नहीं है।
      उत्तर: शुद्ध

      3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:
      (क) कवि बिहारी ने मुख्य रूप से कैसे दोहों की रचना की है?
      उत्तर: कवि बिहारी ने मुख्य रूप से श्रृंगार रस के दोहों की रचना की है, साथ ही भक्ति और नीतिपरक दोहे भी लिखे हैं।

        (ख) कविवर बिहारी किनके आग्रह पर जयपुर में ही रुक गए?
        उत्तर: कविवर बिहारी महाराज जयसिंह के आग्रह पर जयपुर में ही रुक गए।

        (ग) कवि बिहारी की ख्याति का एकमात्र आधार-ग्रंथ किस नाम से प्रसिद्ध है?
        उत्तर: उनकी ख्याति का आधार-ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ नाम से प्रसिद्ध है।

        (घ) किसमें किससे सौ गुनी अधिक मादकता होती है?
        उत्तर: कनक (सोने) में कनक (धतूरे) से सौ गुनी अधिक मादकता होती है।

        (ङ) कवि ने गोपीनाथ कृष्ण से क्या-क्या न गिनने की प्रार्थना की है?
        उत्तर: कवि ने श्रीकृष्ण से अपने गुण और अवगुणों (पाप-पुण्य) की गणना न करने की प्रार्थना की है।

        4. अति संक्षेप में उत्तर दो:

        (क) किस परिस्थिति में कविवर बिहारी काव्य-रचना के लिए जयपुर में ही रुक गए थे?
        उत्तर: जब बिहारी जयपुर पहुँचे, तब महाराज जयसिंह अपनी नई रानी के प्रेम में मग्न होकर राजकाज भूल चुके थे। बिहारी के एक मार्मिक दोहे (“नहिं परागु नहिं मधुर मधु…”) ने महाराज की आँखें खोल दीं। उनकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर महाराज ने उन्हें प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण मुद्रा (अशर्फी) देने का वचन दिया, जिसके बाद वे वहीं रुक गए।

          (ख) ‘यहि बानक मो बसौ, सदा बिहारीलाल’ – का भाव क्या है?
          उत्तर: इसका भाव यह है कि कवि श्रीकृष्ण के उस मनमोहक रूप (सिर पर मोर-मुकुट, कमर में पीतांबर, हाथ में मुरली) को अपने हृदय में सदा के लिए बसा लेना चाहते हैं।

          (ग) ‘ज्यों-ज्यों बूड़ै श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होई’ – का आशय स्पष्ट करो?
          उत्तर: इसमें विरोधाभास अलंकार है। इसका आशय है कि मन जैसे-जैसे ‘श्याम’ (कृष्ण) के काले रंग में डूबता है, वैसे-वैसे वह विकारों से मुक्त होकर और अधिक ‘उज्ज्वल’ (पवित्र) होता जाता है।

          (घ) ‘आँटे पर प्रानन हरै, काँटे लौं लगि पाय’ – के जरिए कवि क्या कहना चाहते हैं?
          उत्तर: कवि कहना चाहते हैं कि दुष्ट व्यक्ति यदि झुककर पैर भी छुए (नम्रता दिखाए), तो भी उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। वह उस काँटे के समान है जो पैर पड़ने पर झुकता तो है, पर अंततः चुभकर प्राणघातक कष्ट देता है।

          (ङ) ‘मन काँचैं नाचै बृथा, साँचे राँचे रामु’ – का तात्पर्य बताओ।
          उत्तर: इसका तात्पर्य है कि जिसका मन कांच की तरह कच्चा और चंचल है, उसका बाहरी आडंबर (माला जपना, तिलक लगाना) व्यर्थ है। ईश्वर तो केवल सच्चे और निष्कलंक मन में ही निवास करते हैं।

          5. संक्षेप में उत्तर दो:

          (क) कवि के अनुसार अनुरागी चित्त का स्वभाव कैसा होता है?
          उत्तर: कवि के अनुसार ईश्वर प्रेमी हृदय की गति अत्यंत विचित्र होती है। वह संसार के सामान्य नियमों से परे है। यह मन जितना अधिक भगवान कृष्ण के काले रंग (भक्ति) में डूबता है, उतना ही अधिक सफेद और पवित्र (पापमुक्त) होता जाता है।

            (ख) सज्जन का स्नेह कैसा होता है?
            उत्तर: सज्जन का स्नेह ‘मंजीठ’ के रंग के समान पक्का और गहरा होता है। जिस प्रकार मंजीठ से रंगा कपड़ा फट भले ही जाए, पर उसका रंग नहीं छूटता, वैसे ही सज्जन का प्रेम समय बीतने पर भी फीका नहीं पड़ता।

            (ग) धन के संचय के संदर्भ में कवि ने कौन-सा उपदेश दिया है?
            उत्तर: कवि ने उपदेश दिया है कि केवल धन का संचय करना ही बुद्धिमानी नहीं है। यदि व्यक्ति संकट में होने पर भी धन खर्च नहीं करता या दूसरों की मदद नहीं करता, तो वह धन व्यर्थ है। धन का संचय उतना ही श्रेयस्कर है, जो विपत्ति में सहायक हो सके।

            (घ) दुर्जन के स्वभाव के बारे में कवि ने क्या कहा है?
            उत्तर: दुर्जन व्यक्ति स्वभाव से हिंसक और कपटी होता है। वह अपनी नम्रता का ढोंग करके दूसरों को धोखा देता है। कवि ने उसकी तुलना काँटे से की है, जो झुककर भी अंत में दुःख ही पहुँचाता है।

            (ङ) कवि बिहारी किस वेश में अपने आराध्य कृष्ण को मन में बसा लेना चाहते हैं?
            उत्तर: कवि श्रीकृष्ण के ‘ग्वाल’ रूप को मन में बसाना चाहते हैं, जिसमें वे सिर पर मोरपंख का मुकुट, गले में वैजयंती माला, हाथ में बाँसुरी और शरीर पर पीला वस्त्र (पीतांबर) धारण किए हुए हैं।

            (च) अपने उद्धार के प्रसंग में कवि ने गोपीनाथ कृष्णजी से क्या निवेदन किया है?
            उत्तर: कवि निवेदन करते हैं कि हे कृष्ण! आपने संसार के अनेक अधम पापियों का उद्धार किया है। मेरी विनती है कि आप मेरे अवगुणों और पापों की गिनती न करें और अपनी ‘तारनहार’ की ख्याति के अनुरूप मेरा भी उद्धार कर दें।

            (छ) कवि बिहारी की लोकप्रियता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत करो।
            उत्तर: बिहारीलाल रीतिकाल के सबसे लोकप्रिय कवि हैं। उनकी एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ ने उन्हें अमर कर दिया। वे अपनी ‘समाहार शक्ति’ के लिए प्रसिद्ध हैं, यानी बहुत कम शब्दों में गहरा अर्थ भर देना। उनके बारे में कहा जाता है— “सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”

            6. सप्रसंग व्याख्या करो:

            (क) ‘कोऊ कोरिक संग्रहो… बिपति बिदारनहार।।’
            प्रसंग: इस दोहे में कवि ने सांसारिक धन की तुलना में भक्ति रूपी धन की श्रेष्ठता बताई है।
            व्याख्या: कवि कहते हैं कि कोई भले ही करोड़ों का धन इकट्ठा कर ले, लेकिन उनकी वास्तविक संपत्ति तो ‘यदुपति’ श्रीकृष्ण ही हैं। सांसारिक धन संकट के समय साथ छोड़ सकता है, लेकिन कृष्ण रूपी संपत्ति हर विपत्ति का नाश करने वाली और सदैव साथ रहने वाली है।

              (ख) ‘जप-माला, छापैं, तिलक… सांचै रांँचै रामु।।’
              प्रसंग: यहाँ कवि ने बाहरी पाखंड और दिखावे की भक्ति का खंडन किया है।
              व्याख्या: कवि कहते हैं कि हाथ में माला जपने, माथे पर तिलक लगाने या राम-नाम छपे वस्त्र पहनने से ईश्वर प्राप्त नहीं होते। यदि मन कच्चा और चंचल है, तो ये सब बाहरी आडंबर व्यर्थ हैं। भगवान राम तो केवल सच्चे मन की भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं।

              (ग) ‘कनक कनक तैं सौ गुनी… इहिं पाएँ बौंराइ।।’
              प्रसंग: इसमें यमक अलंकार के माध्यम से धन के नशे के घातक प्रभाव को दर्शाया गया है।
              व्याख्या: कवि कहते हैं कि सोने (कंचन) में धतूरे से सौ गुनी अधिक मादकता होती है। धतूरा तो केवल खाने पर नशा चढ़ाता है, लेकिन सोना (धन) तो केवल पा लेने मात्र से ही मनुष्य को अहंकारी और पागल बना देता है।

              (घ) ‘ओछे बड़े न ह्वै सकैं… फारि निहारै नैन।।’
              प्रसंग: यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि बाहरी प्रयास से मनुष्य के आंतरिक गुण या कद नहीं बदलता।
              व्याख्या: नीच या तुच्छ स्वभाव का व्यक्ति चाहे कितना भी दिखावा कर ले, वह महान नहीं बन सकता। जिस प्रकार अपनी आँखों को फाड़कर बड़ा कर लेने से आँखों का प्राकृतिक आकार नहीं बढ़ता, उसी प्रकार बनावटीपन से कोई बड़ा नहीं होता। बड़प्पन गुणों से आता है, दिखावे से नहीं।

              संक्षिप्त प्रश्न (Short type questions)

              1. कवि बिहारी किस वेष में अपने आराध्य कृष्ण को मन में बसा लेना चाहते हैं?
              उत्तर: कवि बिहारी श्रीकृष्ण के उस मनमोहक रूप को अपने हृदय में बसाना चाहते हैं, जिसमें उनके सिर पर मोर-मुकुट, कमर में पीतांबर (काछनी), हाथ में मुरली और गले में वैजयंती माला सुशोभित हो।

              2. कवि के अनुसार अनुरागी चित्त का स्वभाव कैसा होता है?
              उत्तर: कवि के अनुसार ईश्वर-प्रेमी (अनुरागी) मन का स्वभाव अत्यंत विचित्र होता है। यह मन जितना अधिक श्रीकृष्ण के ‘श्याम’ (काले) रंग में डूबता है, उतना ही अधिक पवित्र और उज्ज्वल होता जाता है।

              3. अपने उद्धार के प्रसंग में कवि गोपीनाथ कृष्णजी से क्या निवेदन किया है?
              उत्तर: कवि बिहारी भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके गुण और अवगुणों (पापों) की गिनती न करें। जिस प्रकार उन्होंने अन्य अधम पापियों का उद्धार किया है, उसी प्रकार अपनी ‘तारनहार’ की ख्याति के अनुरूप कवि का भी बेड़ा पार लगा दें।

              4. सज्जन का स्नेह कैसा होता है?
              उत्तर: सज्जन का स्नेह ‘मंजीठ’ के रंग के समान स्थायी और गहरा होता है। जिस प्रकार मंजीठ से रंगा कपड़ा फट जाने पर भी अपना रंग नहीं छोड़ता, उसी प्रकार सज्जन का प्रेम समय और परिस्थिति बदलने पर भी फीका नहीं पड़ता।

              5. धन के संचय के संदर्भ में कवि ने कौन-सा उपदेश दिया है?
              उत्तर: कवि का उपदेश है कि धन का अंधाधुंध संचय करना व्यर्थ है। यदि मनुष्य दुर्दशाग्रस्त होने पर भी धन का उपयोग नहीं करता या परोपकार में नहीं लगाता, तो वह धन किसी काम का नहीं। संचय उतना ही श्रेयस्कर है जो संकट में सहायक हो।

              6. कवि बिहारी ने अपने भक्तिपरक दोहों के जरिए क्या कहा है?
              उत्तर: भक्तिपरक दोहों के माध्यम से बिहारी ने स्पष्ट किया है कि ईश्वर की प्राप्ति बाहरी आडंबरों (तिलक, माला आदि) से नहीं, बल्कि मन की शुद्धि और निष्काम प्रेम से होती है।

              7. कवि बिहारी ने अपने नीतिपरक दोहों के माध्यम से कौन-सी बातें की हैं?
              उत्तर: नीतिपरक दोहों में कवि ने सज्जन-दुर्जन के अंतर, धन के नशीले प्रभाव, संगति के असर और मानवीय गरिमा जैसे विषयों पर व्यावहारिक ज्ञान दिया है।

              8. कवि बिहारी का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय दो।
              उत्तर: कवि बिहारीलाल रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनका जन्म 1595 ई. में ग्वालियर के पास हुआ था। उनकी एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ है, जिसमें लगभग 700 दोहे हैं। वे कम शब्दों में गंभीर अर्थ भरने (गागर में सागर भरने) के लिए प्रसिद्ध हैं।

              9. दुर्जन के स्वभाव के बारे में कवि बिहारीलाल ने क्या कहा है?
              उत्तर: कवि के अनुसार दुर्जन व्यक्ति का स्वभाव काँटे के समान होता है। वह सामने झुककर (नम्रता दिखाकर) भी अंततः कष्ट ही पहुँचाता है। दुष्ट व्यक्ति अवसर मिलते ही अपने स्वभाव के अनुरूप घात करता है।

              10. कवि बिहारी ने मुख्य रूप से कैसे दोहे की रचना की है?
              उत्तर: बिहारी ने मुख्य रूप से श्रृंगार रस के दोहे रचे हैं, परंतु उनके काव्य में भक्ति और नीति का भी सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

              11. किसमें किससे सौ गुनी अधिक मादकता होती है?
              उत्तर: कवि बिहारी के अनुसार ‘कनक’ (सोने/धन) में ‘कनक’ (धतूरे) से सौ गुनी अधिक मादकता होती है, क्योंकि धतूरा तो खाने पर नशा देता है, पर सोना केवल पाने मात्र से मनुष्य को उन्मत्त बना देता है।

              12. दोहा दशक’ में वर्णित दुर्जन के बारे में उल्लेख करो।
              उत्तर: पाठ के आधार पर दुर्जन वह है जो कपटपूर्ण व्यवहार करता है। वह नम्रता का ढोंग तो करता है, परंतु उसका उद्देश्य दूसरों को पीड़ा पहुँचाना ही होता है। ऐसे व्यक्ति पर विश्वास करना घातक हो सकता है।

              13. ‘यहि बानक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल’ का भाव क्या है?
              उत्तर: इसका भाव यह है कि कवि श्रीकृष्ण के पारंपरिक ‘ग्वाल’ रूप के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं और चाहते हैं कि उनका यही सलोना रूप सदा उनके हृदय में निवास करे।

                विवरणात्मक प्रश्न

                सप्रसंग व्याख्या:

                (क) जप-माला, छापें तिलक, सरै न एकौ काम। मन काँचे नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु॥

                संदर्भ: यह दोहा कविवर बिहारीलाल द्वारा रचित ‘दोहा दशक’ से उद्धृत है।

                प्रसंग: इसमें कवि ने बाहरी दिखावे और पाखंडपूर्ण भक्ति का विरोध किया है।

                व्याख्या: कवि कहते हैं कि केवल हाथ में माला जपने, माथे पर तिलक लगाने या राम-नाम अंकित वस्त्र पहनने से कोई भी आध्यात्मिक कार्य सिद्ध नहीं होता। जिसका मन कांच की तरह कच्चा (चंचल और अस्थिर) है, उसका भक्ति का प्रदर्शन व्यर्थ है। भगवान राम तो केवल सच्चे और निर्मल मन की भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं।

                (ख) कनक कनक तैं सौं गुणी, मादकता अधिकाइ। उहिं खाए बौराइ जगु। इहिं पाएँ बौराइ॥

                संदर्भ: यह दोहा बिहारीलाल के सुप्रसिद्ध नीतिपरक दोहों में से एक है।

                प्रसंग: यहाँ धन और स्वर्ण के अहंकारपूर्ण प्रभाव का वर्णन किया गया है।

                व्याख्या: कवि कहते हैं कि स्वर्ण (सोने) में धतूरे की तुलना में सौ गुना अधिक नशा होता है। धतूरे के फल को तो खाने के बाद व्यक्ति अपनी सुध-बुध खोता है (बौराय), परंतु सोने (धन-संपत्ति) की विशेषता यह है कि इसे मात्र प्राप्त कर लेने से ही मनुष्य अहंकार के मद में अंधा और पागल हो जाता है।

                (ग) ओछे बड़े न ह्वै सकें, लगौ सतर है गैन। दीरघ होंहि न नैंक हूँ, फारि निहारै नैन॥

                संदर्भ: यह दोहा बिहारी की ‘बिहारी सतसई’ से लिया गया है।

                प्रसंग: इसमें कवि ने बताया है कि कृत्रिम प्रयासों से मनुष्य का मूल स्वभाव या कद नहीं बदलता।

                व्याख्या: कवि कहते हैं कि तुच्छ (ओछे) स्वभाव का व्यक्ति चाहे आकाश की ऊँचाइयों को छूने का दिखावा करे, वह महान नहीं बन सकता। जिस प्रकार अपनी आँखों को फाड़कर बड़ा-बड़ा करके देखने से आँखों का वास्तविक आकार जरा भी बड़ा नहीं होता, उसी प्रकार आडंबर करने से कोई व्यक्ति बड़ा या श्रेष्ठ नहीं बन जाता।

                (घ) सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल। यहि बानक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल॥

                संदर्भ: यह दोहा बिहारी के भक्तिपरक काव्य का अंश है।

                प्रसंग: इसमें कवि ने अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन किया है।

                व्याख्या: कवि श्रीकृष्ण के उस विशिष्ट वेश पर मुग्ध हैं जिसमें उन्होंने सिर पर मुकुट, कमर में पीतांबर, हाथों में बाँसुरी और हृदय पर माला धारण की है। कवि प्रार्थना करते हैं कि हे बिहारीलाल (कृष्ण)! आपका यही मनमोहक रूप सदा मेरे हृदय में बसा रहे।

                आशय स्पष्ट करो:

                (क) कोऊ कोरिक संग्रहो, बिपति बिदारनहार।
                उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि संसार के लोग भले ही करोड़ों की संपत्ति (सोना-चाँदी) इकट्ठा कर लें, परंतु कवि के लिए उनकी वास्तविक संपत्ति श्रीकृष्ण हैं। सांसारिक धन संकट में साथ छोड़ सकता है, लेकिन ‘विपत्ति विदारनहार’ (संकट काटने वाले) कृष्ण ही सच्चे रक्षक और चिरस्थायी संपत्ति हैं।

                (ख) न ए बिससिये लखि नये, लगि पाय। काँटे लौं।
                उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि दुष्ट (दुर्जन) व्यक्ति की अचानक दिखाई गई नम्रता पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार पैर के नीचे आने वाला काँटा झुकता तो है, पर उसका उद्देश्य केवल चुभकर गहरी पीड़ा देना होता है, वैसे ही दुर्जन व्यक्ति पैर पकड़कर भी अंततः अहित ही करता है।

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