गांँधी और कबीर
- गांधी और कबीर की विचारधाराओं में कहां-कहां समानताएं हैं?
उत्तर:
दोनों अहिंसा और सत्य पर विश्वास करते थे।
दोनों का उद्देश्य समाज सुधार और आध्यात्मिक उत्थान था।
दोनों ने वर्ग और जात-पात के भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई।
- गांधी के अनुसार एकमात्र परमात्मा कौन है?
उत्तर: सत्य और ईश्वर को एक रूप में माना गया है; उनका मूल सिद्धांत ‘सत्य’ है। - कबीर और गांधी के राम कौन हैं?
उत्तर: राम दोनों के लिए आदर्श और धार्मिक आदर्श के रूप में हैं; कबीर के राम भाव और प्रेम के प्रतीक हैं, गांधी के राम कर्म और सत्य के प्रतीक। - ‘अन्न त्यागने से गोपाल नहीं मिल सकते, अध्यात्मिक सिद्धि नहीं हो सकती।’- यह किसका मत है?
उत्तर: कबीर का मत। - गांधी के धार्मिक मतों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
गांधी ने सभी धर्मों का सम्मान किया और सत्य, अहिंसा और करुणा को सर्वोपरि माना।
उनका धर्म व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों में नैतिकता और कर्म की प्रेरणा देता है।
- ‘सर्वग्राही प्रेम कबीर का बल था, यही गांधी का बल है।’- कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर: कबीर का प्रेम समस्त मानवता के लिए था और गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से उसी प्रेम का प्रयोग किया। - ‘अछूत अछूत नहीं है। उन्हें अछूत मानकर हम स्वयं अछूत बन रहे हैं।’- लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर: जात-पात का भेदभाव मानवता और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है; किसी को नीचा समझना स्वयं की आत्मा की दुर्बलता दिखाता है।
व्याख्या
(क) बुराई का नाश करने के लिए बुरे का शत्रु होना जरूरी नहीं है। बुरे का मित्र होकर भी बुराई का नाश किया जा सकता है।
उत्तर:
सच्चा परिवर्तन अहिंसा और प्रेम से संभव है। व्यक्ति बुरे से मित्रता कर उसके हृदय में बदलाव ला सकता है।
(ख) यदि कबीर अपनी ही कविता के समान, सीधी-सादी भाषा में उल्लिखित आदर्श है, तो गांधी उसकी और भी सुबोध क्रियात्मक व्याख्या।
उत्तर:
गांधी ने कबीर के आदर्शों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने कर्म और आंदोलन में भी लागू किया।
(ग) ‘केवल आचरण का भेद है, तथ्य का नहीं।’
उत्तर:
सत्य और धर्म के मूल सिद्धांत एक जैसे हैं; केवल व्यक्तियों का आचरण उनके अनुप्रयोग में भिन्न होता है।
- गांधी जी कब हरिजन-यात्रा में निकले थे?
उत्तर: 1933 में, हरिजन उत्थान और छुआछूत विरोध के लिए। - गांधी की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर: सत्य और अहिंसा के प्रति अडिग निष्ठा और समाज सुधार की प्रतिबद्धता।